Dasha Mata Katha | दशा माता व्रत कथा और पूजा विधि।

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Dasha mata katha

Human beings have to face sudden and difficult situations many times in their life. In this unfavorable time, their patience is tested. In spite of many efforts, when a person is not able to overcome difficult situations and continues to have problems for a long time, in the end, they pleads before the divine power.

Dasha Mata Vrat Katha is about to get rid of such a crisis situation. Dasha Mata fast is observed on the tenth day of Krishna Paksha of Chaitra month with the desire to correct the direction of life. The person who performs Dasha Mata Vrat Katha with devotion, sadness and poverty are removed from his family and house.

Dasha Mata
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Dasha Mata Poojan Vidhi:

On Friday, Dasha Mata is being worshiped by Suhagan women for the happiness of home. The queues of women were seen in the temples since morning. The women also ties the thread on the tree, revolving around the tree of peepal. Also, made the symbols of the houses outside the temple and wished that happiness and prosperity in the house remains maintained.

On this day, women will observe Dasha Mata Vrat and listen to the Dasha Mata Vrat Katha. During this festival, women also made swastikas and hand raids outside their houses.

Devotees worship Dasha Mata and a large number of women came to worship Peepal tree in the early hours. Dasha Mata Poojan after noon will continue till afternoon. At the place of worship, women will hear the Nal-Damayanti Karha and will also have a thread around their neck. After worship, women will make marks with turmeric and kumkum outside their homes. After cleaning the house, along with household items, they will also buy brooms etc.

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Rules of Dasha Mata Vrat :

Dasha mata Vrat should be performed until life accompanies the body. Particular cleanliness is done in the house during this fast. Also, there is a tradition of buying sweeping equipment etc. related to cleaning.  Women who are fasting will consume food only once a day. Salt is not consumed in this fast. It is believed that after completing the Dasha Mata ki Vrat Katha by rules, the problems related to life are removed within a year.

Read Dasha Mata Vrat Katha Here:

चैत्र के महीने में कृष्ण पक्ष की अँधेरी रात में ब्राह्मण नगरी में सूत की कुकडी से बने  डोरे दे रहा था | रानी महल के झरोखे में बैठी थी | रानी ने दासी से कहा ब्राह्मण को बुलाकर पूछो की वह नगरी में काहे का डोरा दे रहा हैं | दासी ने पूछा तो ब्राह्मण बोला चेत्र कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि को दशामाता व्रत हैं इसलिए  दशामाता व्रत  का डोरा नगरी में दे रहा हूँ |  रानी ने भी ब्राह्मण से डोरा ले लिया दशामाता की पूजा कर डोरा अपने गले में बांध लिया | राजाजी नगर भ्रमण से आये रानी के गले में कच्चे सूत का डोरा पहने देखा पूछा ये गले में सूत  का डोरा क्यों  पहना हैं ? अपने तो शाही  ठाठ हैं | राजा ने रानी से डोरा  तोड़ दिया | रानी  डोरे को पानी में घोल कर पी गई |

उसी दिन से राजा रानी की दशा खराब आ गइ  हो | राजा ने कहा की अब देश छोड़ कर कही चलो | इस नगरी में कोई काम करेंगे तो अच्छा नहीं लगेगा | राजा और रानी देश छोड़ कर चले गये | राजा वहाँ से अपने मित्र के गाँव पहुंचा | वहाँ पर राजा को एक कमरा सोने के लिए दिया उस पर एक खूंटी पर नौ करोड़ का हार लटका था | उसे मोरडी निगल गई |

प्रात: राजा उठा और अपने मित्र से बोला कि मैं यहाँ नहीं रहूँगा | क्योकि मोरडी हार निगल गई और हमारा नाम आएगा  और वह वहाँ से चले गये | मित्र की ओरत बोली की ऐसा मित्र आया जों मेरा हार चुराकर ले गया |  फिर मित्र ने अपनी औरत से कहा की ऐसी कोई बात नहीं हैं | उसकी दशा [ स्थिति ] खराब हैं | आगे गया तो रास्ते में बहन का गाँव आया | वह विश्राम करने के लिये उस गाँव की सरोवर की पाल पर बैठ गया | दासी ने देखा और रानी को जाकर बोली की आपके भैया भाभी सरोवर की पाल पर बैठे हैं | बहन ने पूछा की कैसे हाल में हैं | दासी ने कहा हाल अच्छे नहीं हैं | बहन बोली की उन्हें बोलना की वह वहीं रुके में वही आ रही हूँ |

रानी दासी के साथ वही भोजन ले गई भाई ने भोजन किया लेकिन भाभी ने खड्डा खोदकर वही गाड़ दिया | आगे एक गाँव आया वहाँ दोनों एक बगीचे में जाकर बैठे और बगीचा सुख़ गया | माली ने दोनों को निकाल दिया बोला कैसे लोग आये बगीचा सुख़ गया |

आगे गये एक नगरी में विवाह हो रहा था | कुम्हार – कुम्हारिन चंवरी ले कर रहे थे , राजा व रानी बोले हम भी चले | इतना कहते ही उनके हाथ से चंवरी गिरकर छुट गयी | आगे आये तो रानी के पीहर का गाँव आया , वे कुए के पास जाकर बैठ गई | वहाँ पर रानी के पीहर की दासी पानी भरने आयी | रानी ने उससे कहा की तेरे राजा से पूछ कर आ की हमें काम पर रखेंगे क्या ? लेकिन मेरी एक शर्त हैं कि मैं झूटे बर्तन नहीं माजुंगी  और सब काम कर दूँगी | ऐसा ही दासी ने जाकर राजा से बोल दिया की एक महिला और उसका पति कोई काम मांग रहे हैं | और उनकी शर्त भी बताई |

रानी ने बोला उन्हें बुला ले | और कोई काम  दे देंगे  दो काम  नहीं करेंगे तो कोई बात नहीं | वह दोनों पति , पत्नी आ गये | पति  को घोड़े की देखरेख का काम दे दिया और पत्नी को रसोई घर के काम में रख दिया | रानी ने नाम पूछा वह बोली दमड़ी हैं | दमड़ी [ रानी ] वहाँ रहने लगी और मन लगा कर काम करने लगी |चैत्र का महिना आया , होली बाद के दिन आये दमड़ी ने रानी से कहा आप मुझे कुछ सामान दे दो मुझे जंगल में जाकर दशामाता की पूजा करनी हैं | रानी ने सूत की कुकडी हल्दी की गांठ रोलिं , मोली , मेहँदी , काजल सब सामान लेकर दशामाता की मन से पूजा की , दशमाता का डोरा लिया व्रत कर एक समय भोजन कर आये | सब शाही ठाठ वापिस आ गये | दमड़ी ने सिर धोया तो उसके सिर में पदम् था | उसकी माँ की आँख से आंसू गिर गया तो दमड़ी बोली यहं क्या हुआ | रानी बोली ऐसा ही पदम् मेरी लडकी के सिर में भी हैं | अब क्या पता वह कहाँ हैं | उसकी याद में मेरे आंसू आ गये | इतने में दमड़ी बोली माँ में तेरी बेटी हूँ और घौड़े की रखवाली करने वाला तेरा जँवाई हैं |

आगे गये कुम्हार का घर आया | वहाँ कुम्हार चंवरी लेकर जा रहा था | राजा रानी गये वैसे ही टुटा हुआ कलश वापस जुड़ गया | तब कुम्हार बोला थौडे दिन पहले एक राजा रानी आये थे चंवरी टूट गई | तब राजा बोला पहले भी हम ही थे तब हमारी दशा खराब थी | आगे गये जों बगीचा सुख़ गया था वो हरा  भरा हो गया ,तो माली बोला पहले एक दुष्ट राजा रानी का पाँव पड़ते ही बाग सुख़ गया तो राजा बोला पहले भी हम आये थे पर तब हमारी दशा खराब थी | अब हमारी दशा अच्छी हो गई | जिससे तुम्हारा बाग हरा भरा हो गया | आगे चला तो मित्र का गाँव आया राजा बोले हम उसी कमरे में ठहरेंगे जहाँ पहले ठहरे थे | उसी कमरे में ठहरे और आधी रात को मोरडी ने हार उगलने लगी तो रानी ने कहा अपने मित्र को बुलाकर लाओ | मित्र ने देखा और अपनी पत्नी की तरफ से माफी मांगी और कहा औरत की बात पर मत जावों | आगे जाकर देखा तो बहन का गाँव आया | दासी पानी भरने आई और देखा और रानी को जाकर कहा आपके भैया भाभी आये हैं ,उनकी हालत भी अच्छी हैं | तब बहन वहाँ गयी और बोली भाभी घर चलो , तो भाभी बोली नहीं बाई जी हम तो आपके घर नही चलेंगे आपको शर्म आएगी |

भाभी ने खड्डा खोदा तो वहा सोने के चक्र निकले बहन ने भाई की आरती उतारी भाई ने सोने के चक्र बहन को दे दिए | और अपने नगर में आये ती वहा की प्रजा अत्यंत प्रसन्न हो गई और सारे गाँव ने  राजा रानी का स्वागत किया | और हवेली में पहले जैसे ठाठ हो गये | इसलिये कहते हैं की  दशा किसी से पूछकर नहीं आती | हे दशामाता जैसी राजा की अच्छी दशा आयी वैसे ही सब पर अपनी कृपा रखना |

|| जय बोलो दशामाता की जय ||

After Dasha Mata ki Katha, the Devotees should perform Dasha Mata Aarti.

Read Dasha Mata Aarti Here:

आरती श्री दशामाता की ।

जय सत -चित्त आनन्द दाता की । ।

भय भंजनि अरु दशा सुधारिणी ।

पाप -ताप -कलि कलुष विदारणी ।

शुभ्र लोक में सदा  विहारिणी । ।

जय पालिनि दीन जनन  की ।

आरती श्री दशामाता की। ।

अखिल विश्व -आनन्द विधायिनी।

मंगलमयी सुमंगल    दायिनी ।

जय पावन प्रेम प्रदायिनी ।

अमिय -राग -रस रंगरली की ।

आरती श्री दशामाता की। ।

नित्यानन्द भयो  आह्लदिनी ।

आनंद घन आनन्द प्रसाधिनि ।

रसमयि रसमय मन उन्मादिनि ।

सरस कमलिनी विष्णुआली की ।

आरती श्री दशामाता की  । ।

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